श्रीमद्भागवत गीता को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग – जन जागरण मंच की पहल
श्रीमद्भागवत गीता को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग – जन जागरण मंच की पहल
गुरुग्राम, 5 दिसंबर 2025 — सामाजिक संस्था जन जागरण मंच ने देश की महामहिम राष्ट्रपति को एक औपचारिक पत्र लिखकर मांग की है कि श्रीमद्भागवत गीता को भारत के राष्ट्रीय ग्रंथ के रूप में संवैधानिक मान्यता प्रदान की जाए। संस्था के अध्यक्ष श्री हरि शंकर कुमार ने स्वयं यह पत्र राष्ट्रपति सचिवालय में जाकर सौंपा।
क्यों रखी गई यह मांग?
पत्र में लिखा गया है कि भारत केवल भौगोलिक सीमाओं या राजवंशों के इतिहास से नहीं पहचाना जाता, बल्कि यह आध्यात्मिकता, संस्कृति और साक्षर मूल्य व्यवस्था से परिभाषित एक राष्ट्र है। भारत की पहचान मानवता को दिशा देने वाले सिद्धांतों से है — धर्म, कर्तव्य, विवेक और ज्ञान।
गीता — आध्यात्मिक विरासत का केंद्रबिंदु
श्रीमद्भागवत गीता को विश्व के सर्वोच्च दार्शनिक ग्रंथों में प्रथम स्थान प्राप्त है।
हरि शंकर कुमार का कहना है कि:
"गीता केवल धार्मिक पुस्तक नहीं है, बल्कि मानव जीवन का विज्ञान, कर्तव्य का ज्ञान, संकट में मार्गदर्शन, चरित्र निर्माण का आधार और राष्ट्र निर्माण का मूल है।"
गीता की शिक्षाएँ — कर्म, संयम, निष्ठा, सहनशीलता, सत्य, साहस और न्याय — एक सशक्त राष्ट्र की आधारशिला मानी जाती हैं। संस्था का कहना है कि इन शिक्षा-आधारित मूल्यों को राष्ट्रीय जीवन में स्थापित करने के लिए गीता का राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाना आवश्यक है।
राष्ट्र निर्माण में गीता की भूमिका
भारत की सभ्यता और संस्कृति का केंद्र हमेशा से रहा है कर्तव्य पर स्थिर रहकर मानवता की सेवा। गीता का संदेश कठिन परिस्थितियों में नैतिक निर्णय, आत्मबल और आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है। आज के समय में, जब समाज मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना की ओर अग्रसर है, गीता का महत्व और भी बढ़ जाता है।
राष्ट्रपति से की गई आधिकारिक अपील
जन जागरण मंच का स्पष्ट मत है कि:
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गीता राष्ट्र के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक धरोहर की धुरी है।
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इसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना भारतीय पहचान और मूल्य-व्यवस्था को संस्थागत रूप से सशक्त करेगा।
इसलिए संस्था ने महामहिम राष्ट्रपति से औपचारिक अनुरोध किया है कि श्रीमद्भागवत गीता को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाए।
✨ निष्कर्ष
श्रीमद्भागवत गीता केवल धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन-प्रबंधन, नैतिकता एवं राष्ट्र-निर्माण की सर्वोत्तम शिक्षाओं का संग्रह है। यदि इसे राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा प्राप्त होता है, तो यह न केवल आध्यात्मिक पहचान को सशक्त करेगा बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मूल्य-आधारित दिशा भी प्रदान करेगा।



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